अमेरिका में दोनों प्रमुख दलों (डेमोक्रेट और रिपब्लिकन) के सीनेटरों के एक समूह ने एक नया प्रतिबंध विधेयक पेश किया है, जो वैश्विक ऊर्जा व्यापार की दिशा बदल सकता है। प्रस्तावित कानून के तहत रूस का कच्चा तेल खरीदना जारी रखने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक का शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है।
'सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2026' नामक यह विधेयक रूसी तेल के पांच प्रमुख खरीदारों—भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान—को निशाना बनाता है। अमेरिकी सांसदों का कहना है कि इससे रूस की तेल आय कम होगी और यूक्रेन युद्ध के लिए धन जुटाने की उसकी क्षमता कमजोर पड़ेगी।
हालांकि, इस प्रस्ताव पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है। नई दिल्ली ने वॉशिंगटन पर "दोहरा मापदंड" अपनाने का आरोप लगाया है, क्योंकि कई यूरोपीय देशों को इस प्रस्तावित कार्रवाई से छूट दी गई है, जबकि वे अब भी रूस से ऊर्जा आयात कर रहे हैं।
रूस की तेल आय पर निशाना
यह नया प्रस्ताव उस पुराने विधेयक का संशोधित रूप है, जो एक वर्ष से अधिक समय तक अमेरिकी कांग्रेस में लंबित रहा। पहले प्रस्ताव में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात थी। संशोधित विधेयक में इसे घटाकर अधिकतम 100 प्रतिशत कर दिया गया है और दंड केवल रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार देशों तक सीमित रखा गया है।
इस प्रस्ताव को सबसे पहले रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पेश किया था, जिसे बाद में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन भी मिला। यदि कांग्रेस इसे पारित कर देती है, तो यह पहला अमेरिकी कानून होगा जो किसी तीसरे देश पर इसलिए टैरिफ लगाने की अनुमति देगा क्योंकि वह किसी अन्य देश की युद्धकालीन अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रहा है।
डेमोक्रेटिक सीनेटर और विधेयक के सह-प्रस्तावक रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा, "यह लक्षित टैरिफ है, जो केवल पांच प्रमुख खरीदारों पर अधिकतम 100 प्रतिशत तक लागू होगा। हमारे यूरोपीय सहयोगी इसके दायरे में नहीं हैं।"
यूरोपीय देशों को छूट पर विवाद
विधेयक में अमेरिका के कई सहयोगी देशों को प्रस्तावित टैरिफ से छूट दी गई है। जिन देशों का रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात में हिस्सा 15 प्रतिशत से कम है और जो रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता घटा रहे हैं, उन्हें दंड नहीं मिलेगा।
सीनेट अधिकारियों के अनुसार, इस छूट का लाभ लगभग 15 यूरोपीय देशों और जापान जैसे सहयोगियों को मिलेगा। यही प्रावधान इस विधेयक का सबसे विवादास्पद हिस्सा बन गया है।
भारत ने अमेरिका पर लगाया दोहरे मापदंड का आरोप
भारतीय अधिकारियों ने इस विधेयक की आलोचना करते हुए कहा कि इससे भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता प्रभावित हो सकती है। भारत अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है।
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया था। सरकार ने इन आपूर्तियों का उपयोग देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए किया।
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में संघर्ष और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ, जिसके चलते भारत ने फिर से रूसी तेल की खरीद बढ़ाई। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका को भारत के साथ यूरोप से अलग व्यवहार नहीं करना चाहिए।
द इकोनॉमिक टाइम्स से बातचीत में एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने कहा, "अमेरिका सही तरीका नहीं अपना रहा है। यूरोप के मामले में उसका रवैया दोहरे मापदंड वाला है और इससे शायद वह परिणाम भी नहीं मिलेगा जिसकी उसे उम्मीद है। अमेरिकी विदेश नीति की विफलताओं का ठीकरा भारत पर फोड़ना उल्टा पड़ सकता है।"
भारत में भी तेज हुई राजनीतिक बहस
इस प्रस्ताव को लेकर भारत में भी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए हैं। पार्टी ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से पूछा है कि यदि यह टैरिफ लागू होता है तो भारत इससे कैसे निपटेगा। कांग्रेस का कहना है कि अपने राष्ट्रीय ऊर्जा हितों की रक्षा करने के कारण भारत को दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
विधेयक के सामने राजनीतिक और कानूनी चुनौतियां
हालांकि इस विधेयक को सीनेट में दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन कानून बनने से पहले इसे कई बाधाओं का सामना करना होगा। विधेयक में राष्ट्रपति को विशेष छूट देने का प्रावधान भी रखा गया है। यदि किसी देश पर टैरिफ लगाने से अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा या वैश्विक आर्थिक स्थिरता प्रभावित होती है, तो व्हाइट हाउस उस देश को अस्थायी राहत दे सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक बाजार से रूसी तेल की आपूर्ति कम होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है और दुनिया भर में ईंधन महंगा हो सकता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर होने से बचाने के लिए बेहद सावधानी से कदम उठाएगा।
कानूनी चुनौती की भी आशंका
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस विधेयक को अदालत में चुनौती मिल सकती है। हाल के वर्षों में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों ने स्पष्ट किया है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना कार्यपालिका व्यापक व्यापारिक प्रतिबंध लागू नहीं कर सकती। विधेयक के समर्थकों का मानना है कि नया कानून इस तरह की कार्रवाई के लिए आवश्यक कानूनी आधार प्रदान करेगा।
सीनेट में जल्द मंजूरी की मांग
'सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2026' को फिलहाल सीनेट में दोनों दलों के 26 सह-प्रायोजकों का समर्थन प्राप्त है। सांसद कांग्रेस से इसे जल्द पारित करने की अपील कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह विधेयक यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए सीनेटर लिंडसे ग्राहम के प्रयासों को आगे बढ़ाता है।
