ईरान ने भारत के तेल टैंकरों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के अहम समुद्री मार्ग से गुजरने की अनुमति दे दी है। यह फैसला विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के बीच हुई बातचीत के बाद लिया गया, ऐसा द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया है।
यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब ईरान अभी भी अमेरिका, यूरोप और इज़राइल से जुड़े टैंकरों और कंटेनर जहाज़ों को इस जलमार्ग का इस्तेमाल करने से रोक रहा है।
जयशंकर और अराघची ने मंगलवार को पश्चिम एशिया में तेजी से बिगड़ती स्थिति पर चर्चा की। पिछले महीने अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने के बाद यह दोनों नेताओं के बीच तीसरी बातचीत थी।
रणनीतिक मार्ग से सुरक्षित गुज़रे भारतीय टैंकर
कूटनीतिक बातचीत के बाद दो भारतीय टैंकर — पुष्पक और परिमल — सुरक्षित रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुजरने में सफल रहे। चर्चाओं से परिचित लोगों ने द इकोनॉमिक टाइम्स को बताया कि इसी इलाके में अमेरिका, यूरोपीय देशों और इज़राइल के जहाज़ों पर अब भी पाबंदियां लागू हैं।
बताया गया कि जयशंकर–अराघची वार्ता का मुख्य उद्देश्य भारतीय तेल टैंकरों की इस जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना था।
खाड़ी क्षेत्र में जहाज़ों पर बढ़ते हमले
भारत और ईरान के बीच यह कूटनीतिक व्यवस्था ऐसे समय में हुई है जब क्षेत्र में जहाज़ों पर हमले बढ़ रहे हैं। रॉयटर्स के अनुसार गुरुवार को खाड़ी क्षेत्र में कम से कम छह जहाज़ों पर हमले किए गए, जिससे समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरे उजागर हुए हैं।
क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने वैश्विक शिपिंग को प्रभावित किया है और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
होर्मुज़ मार्ग पर भारत की बड़ी निर्भरता
बुधवार को मीडिया ब्रीफिंग के दौरान सुजाता शर्मा ने ऊर्जा आयात के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर भारत की निर्भरता के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि भारत अपने लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का लगभग 50 प्रतिशत आयात करता है और इन शिपमेंट्स में से करीब 90 प्रतिशत इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं।
हालांकि शर्मा ने स्पष्ट किया कि कच्चे तेल के मामले में भारत की निर्भरता अपेक्षाकृत कम है। वर्तमान में भारत के लगभग 70 प्रतिशत तेल आयात ऐसे मार्गों से आते हैं जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को बायपास करते हैं।
अमेरिका-इज़राइल हमलों के बाद ईरान का जवाब
अमेरिका और इज़राइल के हमलों के बाद ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी साझेदारों की तेल और गैस सुविधाओं पर जवाबी हमले किए हैं। इन हमलों के कारण कई उत्पादकों को तेल और गैस उत्पादन में तेज कटौती करनी पड़ी है।
साथ ही ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुजरने वाली आवाजाही पर भी प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण गलियारा बाधित हुआ है। सामान्य तौर पर इस जलमार्ग से दुनिया की समुद्री तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20–25 प्रतिशत गुजरता है।
हाल के दिनों में कई तेल टैंकरों पर भी हमले हुए हैं। इन घटनाओं में इन जहाज़ों पर सवार कम से कम दो भारतीय नाविकों की मौत हो चुकी है।
आपूर्ति बाधित होने से तेल की कीमतों में उछाल
उत्पादन में कटौती और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में लगाए गए प्रतिबंधों के संयुक्त प्रभाव से वैश्विक तेल और गैस की कीमतें बढ़ गई हैं। युद्ध शुरू होने से पहले कच्चा तेल करीब 72.48 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
इसके बाद सोमवार को कीमतें बढ़कर 119.50 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर तक पहुंच गईं। हालांकि बाद में कीमतों में थोड़ी गिरावट आई, लेकिन बुधवार को खाड़ी क्षेत्र में जहाज़ों पर हमले बढ़ने के साथ ही यह फिर से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई।
