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अमेरिका ने रूसी और ईरानी तेल पर प्रतिबंध छूट समाप्त की
अमेरिका ने उन प्रतिबंध छूटों को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया है, जिनके तहत रूस और ईरान के तेल की सीमित खरीद की अनुमति दी गई थी। इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारत जैसे देशों पर असर पड़ सकता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने घोषणा की है कि वह उन प्रतिबंध छूटों को आगे नहीं बढ़ाएगा, जिनके तहत देशों को रूस और ईरान से ऊर्जा खरीदने की अनुमति दी गई थी। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बुधवार को इस फैसले की पुष्टि की।

इन छूटों से भारत को काफी लाभ हुआ था। हालांकि, इस नीति की अमेरिकी सांसदों ने कड़ी आलोचना की थी। उनका कहना था कि इससे मॉस्को और तेहरान पर वित्तीय दबाव कम हो रहा है।

एक प्रेस ब्रीफिंग में बेसेंट ने कहा, “हम रूसी तेल पर जारी सामान्य लाइसेंस को नवीनीकृत नहीं करेंगे और न ही ईरानी तेल पर सामान्य लाइसेंस को बढ़ाएंगे। यह वह तेल था जो 11 मार्च से पहले समुद्र में भेजा जा चुका था। इसलिए वह सारा तेल अब इस्तेमाल हो चुका है।”

30-दिन की छूट क्या थी?

12 मार्च को अमेरिकी ट्रेजरी ने एक अल्पकालिक छूट पेश की थी। इसके तहत भारतीय रिफाइनरियों को वह रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी गई थी, जिसे कड़े प्रतिबंध लागू होने से पहले ही भेज दिया गया था।

इस कदम को समझाते हुए बेसेंट ने पहले कहा था, “वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनाए रखने के लिए ट्रेजरी विभाग 30 दिनों की अस्थायी छूट जारी कर रहा है, ताकि भारतीय रिफाइनर रूसी तेल खरीद सकें। यह जानबूझकर अल्पकालिक कदम है और इससे रूसी सरकार को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा, क्योंकि यह केवल उस तेल से जुड़े लेनदेन की अनुमति देता है जो पहले से समुद्र में फंसा हुआ था।”

अमेरिका ने इस कदम को वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए आवश्यक बताया था। उस समय फरवरी 2026 में अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थीं।

बाद में वाशिंगटन ने ईरानी तेल के लिए भी इसी तरह की 30-दिन की छूट जारी की। रूसी तेल पर छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई, जबकि ईरानी तेल पर छूट 19 अप्रैल को खत्म होने वाली है।

भारत प्रमुख लाभार्थियों में

इन अस्थायी राहतों से भारत सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक बनकर उभरा। रिपोर्टों के अनुसार, छूट अवधि के दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने लगभग 3 करोड़ बैरल रूसी तेल का ऑर्डर दिया।

इससे पहले प्रमुख कंपनियों ने अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसे रूसी आपूर्तिकर्ताओं से आयात कम कर दिया था। छूट मिलने से उन्हें सीमित समय के लिए खरीद फिर से शुरू करने का मौका मिला।

नीति बढ़ाने की मांग

फायदे के बावजूद, यह फैसला ऐसे समय आया जब भारत सहित कई एशियाई देशों ने कथित तौर पर वाशिंगटन से इन छूटों को बढ़ाने का अनुरोध किया था। इन देशों को आपूर्ति की स्थिरता और बढ़ती ऊर्जा कीमतों की चिंता थी। हालांकि, अमेरिका ने अस्थायी राहत जारी रखने से इनकार कर दिया।

अमेरिका में राजनीतिक विरोध

इस छूट नीति का अमेरिका में खासकर डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने कड़ा विरोध किया।

अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए कहा, “रूस पर लगे प्रतिबंधों की छूट को किसी भी हालत में बढ़ाया नहीं जाना चाहिए। ट्रम्प की छूट ने रूस को हर दिन अतिरिक्त 150 अरब डॉलर दे दिए हैं, जिससे वह अपनी घातक युद्ध मशीन चला रहा है, जो यूक्रेनी बच्चों को मार रही है और उनका अपहरण कर रही है—साथ ही ईरान को हमारे सैनिकों को निशाना बनाने के लिए खुफिया जानकारी भी मिल रही है।”

अन्य डेमोक्रेटिक नेता, जिनमें सीनेट के अल्पसंख्यक नेता चक शूमर भी शामिल हैं, ने भी चिंता जताई। उन्होंने प्रशासन से इस “खतरनाक” नीति को वापस लेने की मांग की।

एक संयुक्त बयान में सीनेटरों ने कहा, “काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शंस एक्ट के तहत कांग्रेस को सूचना देने की आवश्यकता का पालन किए बिना क्रेमलिन पर लगे प्रतिबंधों को ढीला करने के अलावा, सचिव बेसेंट ने इस लाइसेंस को अस्थायी और ‘अल्पकालिक’ कदम बताया था, जिससे रूसी सरकार को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा।”

उन्होंने आगे कहा, “लेकिन रूस द्वारा अपने प्रस्तावित बजट कटौती को रद्द करने का फैसला यह दिखाता है कि, जैसा हमने चेतावनी दी थी, रूस इस प्रतिबंध राहत से सीधे लाभ उठा रहा है। ट्रम्प प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह इस खतरनाक नीति को पलटे, यह सुनिश्चित करे कि रूस को कोई अतिरिक्त लाभ न मिले और अमेरिका अनजाने में पुतिन की युद्ध मशीन को मजबूत न करे।”

आगे क्या असर हो सकता है

छूट समाप्त होने के बाद भारत जैसे देशों को अब रूसी और ईरानी तेल खरीदने पर अधिक सख्त प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ईंधन की कीमतों पर असर पड़ सकता है।

यह फैसला यह भी संकेत देता है कि अमेरिका अब प्रतिबंधों को लागू करने के मामले में अधिक सख्त रुख अपनाने जा रहा है, जबकि भू-राजनीतिक तनाव लगातार ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर रहे हैं।