संसद का एक महत्वपूर्ण तीन दिवसीय विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू हो रहा है। केंद्र सरकार ऐसे अहम संवैधानिक बदलाव लाने की तैयारी में है, जो भारत की चुनावी संरचना को बदल सकते हैं।
सरकार इस सत्र के दौरान कई महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने की योजना बना रही है। इनमें संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 और परिसीमन विधेयक, 2026 शामिल हैं। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल दोनों विधेयक पेश करेंगे। वहीं गृह मंत्री अमित शाह केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश करेंगे।
प्रमुख विधेयकों को साथ पारित करने की योजना
सरकार मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करने के लिए एक प्रक्रियात्मक कदम भी उठा सकती है। मेघवाल लोकसभा में नियम 66 को निलंबित करने का प्रस्ताव ला सकते हैं। इससे महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन विधेयक को एक साथ पारित करने का रास्ता साफ हो जाएगा।
इससे संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार संसद में महिलाओं के आरक्षण को लागू करने को चुनावी सीमाओं में बदलाव के साथ जोड़ना चाहती है।
लोकसभा की सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव
सरकार की योजना के अनुसार लोकसभा की कुल संख्या में बड़ा इजाफा हो सकता है। सीटों की संख्या 543 से बढ़कर लगभग 850 तक पहुंच सकती है।
इन अतिरिक्त सीटों का बड़ा हिस्सा उत्तरी राज्यों को मिलने की संभावना है। प्रस्ताव में संसद में महिलाओं के लिए लंबे समय से लंबित एक-तिहाई आरक्षण को लागू करने का भी प्रावधान है, जिसे 2023 में मंजूरी दी गई थी।
नई व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में घुमाव (रोटेशन) के आधार पर लागू की जाएंगी।
परिसीमन पर राजनीतिक टकराव की आशंका
यह सत्र तीखी राजनीतिक बहस का कारण बन सकता है। परिसीमन का मुद्दा इस समय सबसे बड़ा विवाद बन गया है। विपक्षी दलों को डर है कि इन बदलावों से उत्तरी राज्यों को फायदा होगा, जबकि दक्षिणी और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस योजना की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसे “खतरनाक योजना” बताते हुए कहा, “बीजेपी की एक खतरनाक योजना यह है कि 2029 के चुनावों के लिए सभी लोकसभा सीटों को अपने फायदे के लिए ‘जेरिमैंडर’ किया जाए।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया, “प्रस्तावित विधेयक परिसीमन से जुड़े सभी संवैधानिक सुरक्षा प्रावधानों को हटा देते हैं, जिससे परिसीमन आयोग को पूरी शक्ति मिल जाएगी, जिसे सरकार खुद नियुक्त और निर्देशित करेगी।”
पिछले परिसीमन पर भी उठे सवाल
राहुल गांधी ने आगे आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ पार्टी ने पहले भी परिसीमन प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है। उन्होंने कहा, “हमने देखा है कि बीजेपी यह कैसे करती है—असम और जम्मू-कश्मीर में परिसीमन को अपने हिसाब से इस्तेमाल किया गया, जहां चुनावी लाभ के लिए बीजेपी विरोधी क्षेत्रों और समुदायों को विभाजित किया गया।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी परिसीमन प्रक्रिया को पारदर्शी होना चाहिए और सभी हितधारकों से उचित परामर्श किया जाना चाहिए।
दक्षिणी राज्यों का विरोध
दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने भी इस प्रस्ताव पर कड़ा विरोध जताया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राज्यभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।
एक सार्वजनिक अपील में उन्होंने कहा, “कल तमिलनाडु के घरों, सड़कों और दुकानों पर काला झंडा लहराने दें। यह हमारे प्रतिरोध का प्रतीक बने। यह किसी एक आंदोलन की लड़ाई नहीं है, बल्कि तमिलनाडु की लड़ाई है।”
यह प्रस्तावित बदलावों को लेकर दक्षिण भारत में बढ़ते विरोध को दर्शाता है।
मुख्य मुद्दा: उत्तर-दक्षिण विभाजन
मुख्य चिंता क्षेत्रीय संतुलन को लेकर है। उत्तरी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है, इसलिए उन्हें अधिक सीटें मिलने की संभावना है।
इसके विपरीत दक्षिणी राज्य—जो भारत के जीडीपी में लगभग 30–31% योगदान देते हैं—धीमी जनसंख्या वृद्धि के कारण सीटों के अपने हिस्से में कमी देख सकते हैं।
विपक्षी दलों का कहना है कि वे महिलाओं के आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। हालांकि वे इसे परिसीमन से जोड़ने का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि महिलाओं के लिए आरक्षण बिना प्रतिनिधित्व के संतुलन को बदले भी लागू किया जा सकता है।
सरकार का पक्ष
सरकार ने अपने प्रस्ताव का बचाव किया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि परिसीमन आयोग कोई भी निर्णय लेने से पहले सभी राजनीतिक दलों से परामर्श करेगा। केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि लोकसभा का विस्तार जरूरी है। सरकार के अनुसार इससे भारत की बढ़ती जनसंख्या को बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।
सूत्रों के मुताबिक, प्रस्ताव के तहत लगभग 815 सीटें राज्यों को और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों को दी जा सकती हैं।
आगे क्या
सत्र शुरू होने के साथ ही इन प्रस्तावित बदलावों पर संसद और उसके बाहर तीखी बहस होने की संभावना है। इसका परिणाम भारत की राजनीति पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है, खासकर आने वाले चुनावों से पहले।
