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स्पष्ट बहुमत न होने के कारण NCLT ने सुभाष चंद्रा के दिवालियापन समझौता आदेश पर लगाई रोक
स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद NCLT ने सुभाष चंद्रा के दिवालियापन समझौते से जुड़े आदेश पर रोक लगा दी है। इससे 22,006 करोड़ रुपये से अधिक के पुनर्भुगतान विवाद पर कानूनी स्थिति फिलहाल अनिश्चित बनी हुई है।
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने मंगलवार को अपने उस पहले के आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें ज़ी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा को 6.25 करोड़ रुपये का भुगतान करके अपनी व्यक्तिगत दिवालियापन कार्यवाही का निपटारा करने की अनुमति दी गई थी। प्रस्तावित भुगतान उनके खिलाफ स्वीकृत 22,006.57 करोड़ रुपये के दावों की तुलना में काफी कम था। ट्रिब्यूनल ने चंद्रा को अपनी संपत्तियां बेचने, हस्तांतरित करने या किसी अन्य तरीके से उनका निपटान करने से भी रोक दिया है। ट्रिब्यूनल प्रमुख अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने कहा कि पहले की पुनर्भुगतान योजना को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं था। इसलिए पीठ ने उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें समझौते को मंजूरी दी गई थी।

NCLT का मामला अब भी अनसुलझा

अलग-अलग ट्रिब्यूनल सदस्यों के परस्पर विरोधी आदेशों के कारण दिवालियापन का यह मामला करीब एक साल से अटका हुआ है। सितंबर 2025 में NCLT की दो सदस्यीय पीठ ने विभाजित फैसला सुनाया था। एक सदस्य ने पुनर्भुगतान योजना का समर्थन किया, जबकि दूसरे ने इसे खारिज कर दिया। योजना का विरोध करने वाले सदस्य ने लेनदारों के दावों को स्वीकार करने और मतदान प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर चिंता जताई थी। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने निर्णायक राय के लिए मामले को तीसरे सदस्य के पास भेज दिया। 25 अगस्त को तीसरे सदस्य निलेश शर्मा ने पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दे दी। हालांकि, उन्होंने कुछ विवादित दावों को बाहर कर दिया और उनके हिस्से को पात्र लेनदारों के बीच दोबारा वितरित करने का आदेश दिया। तीसरे सदस्य के फैसले को पहले के विभाजित फैसले के साथ पढ़ने पर भी स्पष्ट बहुमत नहीं बन सका। इसके बाद NCLT ने मामले की समीक्षा के लिए पांच सदस्यीय विशेष पीठ का गठन किया।

विशेष पीठ ने 25 अगस्त के आदेश पर लगाई रोक

पिछले तीनों आदेशों की समीक्षा करने के बाद पांच सदस्यीय पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि पुनर्भुगतान योजना के समर्थन में ऐसा कोई स्पष्ट बहुमत नहीं था, जिसे कानूनी रूप से लागू किया जा सके। पीठ ने कहा, “यह स्पष्ट है कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419 (5) के अनुसार, ऐसा कोई स्पष्ट बहुमत वाला मत नहीं है जिसे प्रभावी किया जा सके। इसलिए तीसरे सदस्य निलेश शर्मा, सदस्य (न्यायिक), के 25 अगस्त के आदेश पर रोक लगाई जाती है। हम यह भी निर्देश देते हैं कि व्यक्तिगत गारंटर किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हस्तांतरित या निपटान नहीं करेगा। सभी अंतरिम आवेदनों में पक्षकारों को नोटिस जारी किया जाए। यदि कोई जवाब हो, तो उसे अगली सुनवाई की तारीख से पहले दाखिल किया जा सकता है।” ट्रिब्यूनल ने यह भी निर्देश दिया कि कार्यवाही में व्यक्तिगत गारंटर के रूप में वर्णित चंद्रा अपनी किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हस्तांतरित या बेच नहीं सकते। NCLT ने मामले की अगली सुनवाई 23 सितंबर को निर्धारित की है, जो मंगलवार की सुनवाई के करीब तीन सप्ताह बाद होगी।

लेनदारों ने NCLAT में पुनर्भुगतान योजना को चुनौती दी

यह विवाद नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) तक भी पहुंच गया है। पुनर्भुगतान योजना का विरोध करने वाले कुछ लेनदारों ने अपीलीय ट्रिब्यूनल में इसे चुनौती दी है। कार्यवाही के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने यह तय करने के लिए एक दिन का समय मांगा कि असहमति जताने वाले लेनदार अपनी अपील जारी रखना चाहते हैं या नहीं। NCLT के ताजा आदेश का मतलब है कि 6.25 करोड़ रुपये का प्रस्तावित समझौता फिलहाल रोक पर रहेगा। ट्रिब्यूनल अब परस्पर विरोधी फैसलों और लेनदारों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर विचार करेगा।