भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के काफी करीब पहुंच गए हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने यूनाइटेड किंगडम की अपनी यात्रा के दौरान यह जानकारी दी। हालांकि, उन्होंने एक बात स्पष्ट कर दी। भारत इस समझौते पर तभी हस्ताक्षर करेगा, जब उसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में स्पष्ट टैरिफ लाभ मिलेगा।
लंदन में इंडिया ग्लोबल फोरम के 'UK-India Week 2026: Capital Frontiers' में बोलते हुए गोयल ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि भारत अपने आर्थिक हितों से कोई समझौता नहीं करेगा।
भारत अपने निर्यातकों के लिए बेहतर शर्तें चाहता है
गोयल ने कहा कि प्रस्तावित समझौते पर अमेरिका और भारत के बीच उस समय बातचीत हुई थी, जब वाशिंगटन ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत पारस्परिक टैरिफ लगाए थे। उस समय भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया था। इसके बावजूद भारत को अपने कई पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर टैरिफ स्थिति प्राप्त थी। यही बढ़त भारतीय निर्यातकों के लिए इस प्रस्तावित समझौते को आकर्षक बनाती थी।
“पूरे समझौते का आधार यही प्रतिस्पर्धी लाभ था, जो हमें अपने पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में 18 प्रतिशत का मिला था। सिंगापुर को छोड़कर हमारे सभी पड़ोसी और सभी आसियान देशों की तुलना में हमारा टैरिफ कम था। यही कारण था कि यह समझौता हमारे लिए आकर्षक था,” उन्होंने कहा। गोयल ने कहा कि भारत समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले इस प्रतिस्पर्धी बढ़त को सुरक्षित रखना चाहता है।
बातचीत अंतिम चरण में पहुंची
गोयल ने यह टिप्पणी अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीयर की नई दिल्ली यात्रा के बाद की। इस दौरान ग्रीयर ने वाणिज्य मंत्री और भारत के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण की रूपरेखा पर चर्चा की। यह चर्चा इस महीने की शुरुआत में मुख्य वार्ताकार स्तर की बैठकों के बाद हुई। इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों को उम्मीद है कि समझौता जल्द ही अंतिम रूप ले लेगा।
इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा था कि वाशिंगटन और नई दिल्ली समझौते के "बहुत करीब" हैं। गोयल ने भी कहा कि वार्ताकार शेष मुद्दों को सुलझाने में जुटे हुए हैं।
अमेरिका में कानूनी बदलाव से बातचीत हुई जटिल
प्रगति के बावजूद गोयल ने कहा कि अमेरिका में हाल के कानूनी घटनाक्रमों ने नई चुनौतियां पैदा कर दी हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ संबंधी फैसले और 24 जुलाई को समाप्त होने वाली मौजूदा 10 प्रतिशत टैरिफ व्यवस्था ने स्थिति बदल दी है। “सुप्रीम कोर्ट द्वारा टैरिफ को रद्द किए जाने और 24 जुलाई को समाप्त हो रही 10 प्रतिशत टैरिफ व्यवस्था के बाद, हमारे लिए पहले से सहमत समझौते को लागू करने का उचित आधार होना जरूरी है,” उन्होंने कहा।
इन घटनाक्रमों के कारण दोनों देशों को समझौते के कुछ हिस्सों की दोबारा समीक्षा करनी पड़ रही है।
भारत चाहता है स्थायी प्रतिस्पर्धी बढ़त
गोयल ने कहा कि भारत अपने निर्यातकों के लिए ठोस गारंटी चाहता है। सरकार चाहती है कि भारतीय उत्पादों पर उन देशों की तुलना में कम टैरिफ लगे, जिनकी विनिर्माण लागत भारत के समान है। उन्होंने वियतनाम, थाईलैंड, फिलीपींस, इंडोनेशिया, चीन, मलेशिया, बांग्लादेश, श्रीलंका और अन्य पड़ोसी देशों को भारत के प्रमुख प्रतिस्पर्धी बताया।
“हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत को उन देशों की तुलना में प्रतिस्पर्धी लाभ मिले, जो विकास के समान स्तर पर हैं या जिनकी लागत संरचना भारत जैसी है। इनमें वियतनाम, थाईलैंड, फिलीपींस, इंडोनेशिया, चीन, मलेशिया के अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका और हमारे अन्य पड़ोसी देश शामिल हैं,” गोयल ने कहा। उन्होंने कहा कि जब तक अमेरिका ऐसा कानूनी ढांचा तैयार नहीं करता, जो इस प्रतिस्पर्धी लाभ की गारंटी दे, तब तक भारत इस समझौते को लागू नहीं कर सकता।
“जब तक इस प्रतिस्पर्धी बढ़त को अंतिम रूप देने वाला ढांचा तैयार नहीं हो जाता, तब तक हम अमेरिका के साथ समझौते को लागू नहीं कर सकते। फिलहाल चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि अमेरिका किस तरह उपयुक्त कानूनी व्यवस्था और साधनों के जरिए हमें अपने प्रतिस्पर्धियों पर यह बढ़त देगा। जिस दिन यह हो जाएगा, उसी दिन समझौता लागू हो जाएगा,” गोयल ने कहा।
टैरिफ नीति बनी हुई है सबसे बड़ा मुद्दा
फरवरी में दोनों देशों ने एक ऐसे ढांचे पर सहमति जताई थी, जिसके तहत भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने का प्रस्ताव था। इससे भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी देशों पर बड़ा लाभ मिलता।
हालांकि, अमेरिका की टैरिफ नीति में हुए बदलावों के कारण दोनों सरकारों को समझौते के कुछ प्रावधानों पर दोबारा विचार करना पड़ा।
इस ढांचे में यह भी प्रावधान है कि यदि भविष्य में टैरिफ दरों में बदलाव होता है, तो दोनों देशों को अपनी प्रतिबद्धताओं में संशोधन करने का अधिकार होगा। इसलिए अमेरिकी व्यापार नीति का भविष्य इस समझौते के लागू होने की समय-सीमा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
व्यापार साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना रहा।
इस अवधि में भारत ने अमेरिका को 87.3 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का निर्यात किया। वहीं, भारत ने अमेरिका से 52.9 अरब अमेरिकी डॉलर का आयात किया। ये आंकड़े दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ते व्यापारिक संबंधों के महत्व को दर्शाते हैं।
