अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून में उल्लिखित प्रतिबंधों, पाबंदियों और टैरिफ से छूट दे दी है। इस फैसले से भारत और चीन को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि ये दोनों देश रूसी तेल के दुनिया के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं।
लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 ने ट्रंप को रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने और भारत तथा चीन सहित रूसी तेल एवं गैस के प्रमुख आयातकों पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार दिया था।
दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कांग्रेस में इस कानून को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसके तहत अमेरिकी प्रशासन को रूस के कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों से आयात होने वाले सामान पर 30 दिनों के भीतर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया था। यह कानून उन देशों पर भी लागू होता था, जो इसके प्रभावी होने के 30 दिन बाद भी जानबूझकर रूसी ऊर्जा खरीदना जारी रखते। इसके अलावा, रूस को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने में सबसे सक्रिय रूप से मदद करने वाले पांच देशों को भी इसके दायरे में शामिल किया गया था।
ट्रंप ने क्या घोषणा की?
ट्रंप ने कानून के कई प्रावधानों के लागू होने से कुछ दिन पहले ही छूट देने की घोषणा की। उन्होंने सितंबर के मध्य में इस विधेयक पर हस्ताक्षर करके इसे कानून बनाया था।
शुक्रवार शाम जारी एक कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने कहा, “मैं इसके द्वारा ग्राहम एक्ट में निर्धारित ऐसे प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों के लागू होने से छूट दे रहा हूं।”
आदेश में ट्रंप ने पुष्टि की कि उन्होंने कांग्रेस को एक प्रमाणपत्र सौंपा है, जिसमें कहा गया है कि इस समय प्रतिबंधों और पाबंदियों को लागू करने से छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है।
यह फैसला रूस के प्रति ट्रंप के रुख में आए बदलाव के बीच लिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने मॉस्को के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया है, जबकि वह यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की बार-बार आलोचना करते रहे हैं। ट्रंप ने यह भी सुझाव दिया है कि यूक्रेन को एक नए नेता की जरूरत है।
प्रस्तावित प्रतिबंधों को लेकर उन देशों में चिंता बढ़ गई थी, जो रूसी ऊर्जा आपूर्ति पर काफी हद तक निर्भर हैं। दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल भारत को इस कानून के संभावित आर्थिक परिणामों की विशेष चिंता थी।
इस फैसले का भारत के लिए क्या मतलब है?
रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता है। ट्रंप के 100% तक प्रस्तावित टैरिफ से छूट देने के फैसले ने भारतीय रिफाइनरियों के सामने मौजूद एक बड़ी संभावित बाधा को दूर कर दिया है। इससे भारतीय रिफाइनरियां कानून में उल्लिखित अतिरिक्त व्यापारिक दंड का सामना किए बिना रूसी तेल खरीदना जारी रख सकती हैं।
यदि अमेरिकी प्रशासन ये टैरिफ लागू करता, तो भारतीय निर्यातकों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता था, क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वहीं, रूसी ऊर्जा आपूर्ति पर प्रतिबंध लगने से मॉस्को से कच्चे तेल की खरीद व्यावसायिक रूप से अव्यावहारिक हो सकती थी, जिससे भारत की ऊर्जा आपूर्ति संबंधी चुनौतियां और बढ़ जातीं।
ये चिंताएं इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मध्य पूर्व में जारी तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित कर रहा है। यह क्षेत्र भारत की ऊर्जा आपूर्ति का एक प्रमुख स्रोत है। यहां से भारत को कच्चा तेल, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) मिलती है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले ऊर्जा शिपमेंट में व्यवधान के कारण भारत पर अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का दबाव बढ़ गया है।
भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में रूसी कच्चे तेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हाल के महीनों में इसका आयात रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था।
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस धीरे-धीरे भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। यूरोपीय प्रतिबंधों के कारण जब मॉस्को की पारंपरिक बाजारों तक पहुंच सीमित हुई, तो रूस ने भारत और चीन जैसे खरीदारों को भारी छूट पर तेल उपलब्ध कराया।
पिछले साल ट्रंप ने रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर 25% अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ लगाया था, जिससे कुल टैरिफ का बोझ 50% हो गया था।
अतिरिक्त शुल्क के बावजूद भारत ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा। हालांकि, अमेरिका द्वारा रूस की दो प्रमुख तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद आयात में गिरावट आने लगी।
इस साल फरवरी में ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ घटाकर 18% करने की घोषणा की और अतिरिक्त 25% दंडात्मक शुल्क हटा दिया। उस समय उन्होंने दावा किया था कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। हालांकि, भारत सरकार ने ऐसी कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई थी।
भारत के रूसी तेल आयात में स्पष्ट रुझान सामने आने से पहले ही मध्य पूर्व में संघर्ष तेज हो गया, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई अनिश्चितता पैदा हो गई। अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें कम करने के प्रयास में अमेरिका ने रूसी कच्चे तेल पर लागू कुछ प्रतिबंधों से अस्थायी छूट भी दी थी। इन छूटों की अवधि समाप्त होने के बाद भी भारत अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से तेल खरीदता रहा।
पिछले महीने ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित प्रतिबंध संबंधी कानून कथित तौर पर भारत-अमेरिका के बीच जारी व्यापार वार्ता में भी मुश्किलें पैदा कर रहा था। प्रस्तावित दंड से छूट देने का ताजा फैसला इन चिंताओं को कम करने और व्यापार समझौते पर आगे बढ़ने का अवसर पैदा कर सकता है।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में संकेत दिया था कि समझौते का मसौदा लगभग तैयार है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता में आगे की प्रगति की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
रूसी तेल के लिए भारत को चीन से मिल रही है चुनौती
हालांकि, ट्रंप के फैसले से रूसी तेल की खरीद से जुड़े अतिरिक्त टैरिफ का तत्काल खतरा कम हो गया है, लेकिन भारत को एक और चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। यह चुनौती मॉस्को से तेल आपूर्ति हासिल करने के लिए चीन के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा है।
रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों को उम्मीद है कि अक्टूबर और नवंबर में रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति और सीमित हो सकती है, क्योंकि निर्यात घट रहा है और चीन की मांग बढ़ रही है।
आपूर्ति में संभावित कमी के कारण दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक भारत साल के बाकी महीनों में अधिक महंगे स्रोतों से तेल खरीदने के लिए मजबूर हो सकता है।
दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक चीन ने हाल के महीनों में अपनी खरीद बढ़ा दी है। ईरान युद्ध के कारण मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने के बाद चीन की मांग में वृद्धि हुई है। इससे रूसी तेल की खेप हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है।
रॉयटर्स से हाल ही में रूसी कच्चे तेल की बिक्री से जुड़े एक सूत्र ने कहा, “चीन की मांग वास्तव में बहुत अधिक रही है। वे पहले से ही तेल की खेप बुक करने और भारतीय रिफाइनरियों की तुलना में अधिक कीमत चुकाने के लिए तैयार थे।”
इसका मतलब है कि ट्रंप की छूट से राहत मिलने के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों को पर्याप्त रूसी तेल हासिल करने के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। घटते निर्यात, चीन की बढ़ती मांग और लगातार बनी भू-राजनीतिक अनिश्चितता से यह तय होगा कि आने वाले महीनों में भारत को रियायती दरों पर कितना रूसी कच्चा तेल मिल पाता है।