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नई किताब का दावा: ट्रंप ने यूक्रेन में भारतीय शांति सैनिकों के प्रस्ताव को खारिज किया
एक नई किताब में दावा किया गया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसमें यूक्रेन में शांति सैनिकों के रूप में भारतीय या सऊदी सैनिकों को तैनात करने की बात कही गई थी। इस खुलासे ने प्रशासन के भीतर युद्ध समाप्त करने की रणनीति को लेकर मौजूद मतभेदों को उजागर किया है।
हाल ही में प्रकाशित किताब "Regime Change" में दावा किया गया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दिनों में यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की रणनीति को लेकर प्रशासन के भीतर मतभेद थे। किताब के अनुसार, ट्रंप ने उपराष्ट्रपति जेडी वांस के उस प्रस्ताव को तुरंत खारिज कर दिया था, जिसमें भारत या सऊदी अरब के सैनिकों को शांति सेना के रूप में तैनात करने का सुझाव दिया गया था।

ओवल ऑफिस की बैठक में सामने आए मतभेद

लेखकों के अनुसार, यह मतभेद 30 जनवरी 2025 को ओवल ऑफिस में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान सामने आया था। यह बैठक ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस लौटने के केवल 10 दिन बाद हुई थी।

बैठक का उद्देश्य रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की रणनीति तैयार करना था। ट्रंप द्वारा यूक्रेन और रूस के लिए विशेष दूत नियुक्त किए गए सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल कीथ केलॉग ने इस बैठक का आयोजन किया था।

बैठक के दौरान उपराष्ट्रपति जेडी वांस ने कथित तौर पर सुझाव दिया कि भारत या सऊदी अरब जैसे देशों के सैनिक भविष्य में किसी शांति समझौते की निगरानी कर सकते हैं। लेकिन ट्रंप ने तुरंत इस विचार को खारिज कर दिया और कहा, "भारतीय ऐसा नहीं करेंगे। वे इस तरह की चीज़ के लिए भुगतान नहीं करेंगे।"

कीथ केलॉग ने पेश की 'अमेरिका फर्स्ट' योजना

किताब के अनुसार, कीथ केलॉग ने "रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए ट्रंप का ऐतिहासिक शांति समझौता: एक अमेरिका फर्स्ट योजना" शीर्षक से एक मसौदा योजना पेश की।

इस योजना के तहत अमेरिका औपचारिक रूप से रूस द्वारा कब्जे वाले यूक्रेनी क्षेत्रों पर उसके दावों को मान्यता नहीं देता, जबकि यूक्रेन भी सैन्य बल के जरिए उन इलाकों को वापस लेने की कोशिश नहीं करता।

योजना के एक महत्वपूर्ण हिस्से में युद्धविराम की निगरानी के लिए विदेशी शांति सैनिकों की तैनाती शामिल थी। केलॉग ने सुझाव दिया था कि फ्रांस, ब्रिटेन और नीदरलैंड जैसे यूरोपीय देश इसके लिए सैनिक भेज सकते हैं।

नाटो सैनिकों को लेकर जेडी वांस की चिंता

किताब के अनुसार, जेडी वांस ने इस प्रस्ताव पर चिंता व्यक्त की थी। उनका मानना था कि यूक्रेन में नाटो सदस्य देशों के सैनिकों की तैनाती से मॉस्को नाराज हो सकता है और तनाव बढ़ सकता है।

इसके बाद वांस ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल वाल्ट्ज से पूछा कि क्या गैर-यूरोपीय देशों को शांति मिशन में शामिल किया जा सकता है। सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने के बाद वांस ने भारत और सऊदी अरब का नाम सुझाया।

भारत की भूमिका को लेकर ट्रंप का संदेह

किताब के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति सकारात्मक रवैया रखने के बावजूद ट्रंप को इस बात पर संदेह था कि भारत इस मिशन में भाग लेगा या इसके लिए आर्थिक योगदान देगा।

लेखकों के मुताबिक, ट्रंप ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी "उन्हें बहुत पसंद करते हैं और उनसे मिलने आना चाहते हैं," लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा, "भारतीय कभी किसी चीज़ के लिए भुगतान नहीं करते। वे इस तरह की चीज़ के लिए पैसे नहीं देंगे।"

ट्रंप ने कथित तौर पर कहा कि यदि ब्रिटेन या फ्रांस सैनिक भेजना चाहें तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी, बशर्ते अमेरिका को सैन्य या वित्तीय जिम्मेदारी न उठानी पड़े।

यूक्रेन को लेकर ट्रंप की तीखी टिप्पणियां

किताब में दावा किया गया है कि प्रशासन के भीतर यूक्रेनी नेतृत्व को लेकर गहरा संदेह था। कीथ केलॉग की प्रस्तुति के दौरान ट्रंप ने कई बार यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की आलोचना की।

लेखकों के अनुसार, ट्रंप ने जेलेंस्की को "एक खराब वार्ताकार" बताया, जिसने "अपने देश को बर्बाद कर दिया, लेकिन बाइडेन प्रशासन से मदद हासिल करने में बहुत माहिर था।"

किताब में यह भी दावा किया गया है कि ट्रंप ने यूक्रेन को "दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश" बताया था।

गुप्त वार्ताओं को लेकर भी उठे सवाल

किताब के अनुसार, ट्रंप ने कीथ केलॉग की टीम को रूसी अधिकारियों से संपर्क न करने का निर्देश दिया था। कथित तौर पर ट्रंप ने कहा, "आपकी टीम का कोई भी व्यक्ति इन लोगों से बात नहीं करेगा, क्योंकि हम एक समझौते पर काम कर रहे हैं।"

किताब के मुताबिक, कीथ केलॉग कभी यह नहीं जान पाए कि ट्रंप के "हम" से उनका क्या मतलब था। लेखकों का मानना है कि ट्रंप ने संभवतः किसी अज्ञात तीसरे पक्ष को आधिकारिक सरकारी चैनलों से बाहर रहकर बातचीत की जिम्मेदारी दे रखी थी।

व्हाइट हाउस ने अभी तक "Regime Change" में किए गए दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि, पुस्तक में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।