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अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के बीच तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचीं
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं, जिससे होर्मुज़ जलडमरूमध्य के जरिए आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ गया है।

सप्ताह की शुरुआत में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया। यह बढ़ोतरी उस समय आई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को नया अल्टीमेटम दिया। वहीं, ईरान ने भी चेतावनी दी कि वह महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर सकता है। इस स्थिति ने वेस्ट एशिया में तनाव बढ़ा दिया है और वैश्विक तेल आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा की आशंका बढ़ा दी है।

ब्रेंट क्रूड, जो वैश्विक बेंचमार्क है, लगभग 1.6 प्रतिशत बढ़कर सोमवार सुबह के कारोबार में 113 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) लगभग 2 प्रतिशत बढ़कर करीब 100 डॉलर प्रति बैरल हो गया। यह तेज बढ़ोतरी दर्शाती है कि भू-राजनीतिक जोखिम फिर से वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित कर रहे हैं।

अल्टीमेटम और कड़ी चेतावनी

यह उछाल ट्रंप की सख्त चेतावनी के बाद आया। उन्होंने कहा कि अगर 48 घंटे के भीतर होर्मुज़ जलडमरूमध्य नहीं खोला गया, तो अमेरिका ईरान के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को “नष्ट” कर देगा। यह मार्ग दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति को ले जाता है।

इसके जवाब में ईरान ने सख्त रुख अपनाया। उसने कहा कि वह इस जलमार्ग को पूरी तरह बंद कर सकता है और तब तक बंद रखेगा जब तक क्षतिग्रस्त ढांचे का पुनर्निर्माण नहीं हो जाता। साथ ही, तेहरान ने चेतावनी दी कि किसी भी हमले की स्थिति में वह क्षेत्र में अमेरिकी और इजरायली ऊर्जा तथा संचार ढांचे को निशाना बना सकता है।

यह तनाव उस समय बढ़ रहा है जब संघर्ष चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं और महत्वपूर्ण ढांचे पर खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

आपूर्ति में बाधा की आशंका

तेल आपूर्ति को लेकर चिंता और गहरी हो गई है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य के जरिए शिपमेंट काफी धीमी हो गई है, जिससे वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ा है।

तेल की कीमतें फरवरी के अंत में लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर अब 110 डॉलर से ऊपर पहुंच गई हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए सबसे खराब परिदृश्य को दर्शाती है।

व्यापारियों को अब लंबे समय तक बाधा रहने की आशंका है और निकट भविष्य में आपूर्ति के विकल्प सीमित नजर आ रहे हैं।

निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने चेतावनी दी है कि अगर आपूर्ति संबंधी समस्याएं और भू-राजनीतिक तनाव जारी रहते हैं, तो ऊंची तेल कीमतें 2027 तक बनी रह सकती हैं।

वैश्विक बाजारों पर असर

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर ईंधन लागत पर पड़ रहा है। अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत बढ़कर करीब 3.94 डॉलर प्रति गैलन हो गई है, जो संघर्ष शुरू होने के बाद लगभग 1 डॉलर ज्यादा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कीमतें जल्द ही 4 डॉलर के पार जा सकती हैं। भले ही तनाव कम हो जाए, कीमतों में राहत धीरे-धीरे ही मिल सकती है।

वित्तीय बाजारों पर भी इसका नकारात्मक असर दिख रहा है। शुरुआती कारोबार में अमेरिकी शेयर फ्यूचर्स गिर गए। डाउ फ्यूचर्स लगभग 0.6 प्रतिशत नीचे रहे, जबकि S&P 500 और नैस्डैक फ्यूचर्स 0.6 से 0.8 प्रतिशत तक गिर गए। इससे निवेशकों के बीच बढ़ती सतर्कता साफ दिखती है।

आर्थिक चिंताएं बढ़ीं

अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बढ़ती ऊर्जा कीमतों के दबाव को स्वीकार किया। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि अगर इससे दीर्घकालिक भू-राजनीतिक स्थिरता मिलती है, तो अमेरिकी नागरिक “अस्थायी रूप से बढ़ी कीमतों” को स्वीकार कर सकते हैं।

फिर भी अर्थशास्त्री चिंतित हैं। उनका कहना है कि लंबे समय तक ऊंची तेल कीमतें वैश्विक महंगाई बढ़ा सकती हैं और केंद्रीय बैंकों के लिए नीतियां संभालना मुश्किल कर सकती हैं।

भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है। बढ़ती ऊर्जा लागत आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है और वित्तीय दबाव बढ़ा सकती है।