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मतदाता सूची पुनरीक्षण के खिलाफ ममता खुद कर सकती हैं पैरवी
ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग द्वारा किए जा रहे मतदाता सूची पुनरीक्षण को चुनौती दी है। उन्होंने इसे अनुचित बताया है और कहा है कि यह वास्तविक मतदाताओं के लिए नुकसानदेह है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में अपना मामला स्वयं बहस करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बन सकती हैं। ऐसा तब होगा, जब अदालत उन्हें इसकी अनुमति देगी। भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—SIR) के खिलाफ उनकी याचिका पर बुधवार को सुनवाई होगी।

अदालत उनकी याचिका के साथ ही उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं द्वारा दायर समान याचिकाओं पर भी सुनवाई करेगी।

पश्चिम बंगाल में SIR को रद्द करने की मांग

अपनी याचिका में ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट से पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को पूरी तरह रद्द करने की मांग की है। उन्होंने अनुरोध किया है कि 2026 के विधानसभा चुनाव केवल मौजूदा 2025 की मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएं।

उन्होंने पुनरीक्षण प्रक्रिया का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि निर्वाचन आयोग ने चुनाव से ठीक पहले यह प्रक्रिया शुरू की। उनका यह भी तर्क है कि सत्यापन के नाम पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं।

ECI के आदेशों और नियमों को चुनौती

प्रशिक्षित वकील ममता बनर्जी ने अदालत से 24 जून 2025 और 27 अक्टूबर 2025 को जारी SIR से जुड़े सभी आदेशों को रद्द करने की मांग की है। उन्होंने उनसे संबंधित सभी निर्देशों को भी चुनौती दी है।

उन्होंने अदालत से रिट जारी कर निर्वाचन आयोग को निर्देश देने का आग्रह किया है कि विधानसभा चुनाव बिना बदली गई 2025 की मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएं। उनका कहना है कि SIR वर्ष 2002 के मतदाता आधार पर निर्भर करता है और इसमें “कठोर” सत्यापन प्रणाली अपनाई गई है, जो मताधिकार के लिए खतरा है।

“तार्किक विसंगतियों” पर आपत्ति

याचिका में “तार्किक विसंगतियों” के आधार पर चिह्नित मतदाताओं को लेकर चिंता जताई गई है। इनमें वर्तनी की गलतियां, नामों में अंतर और छोटे डेटा संबंधी त्रुटियां शामिल हैं।

ममता बनर्जी ने अदालत से ऐसे मामलों में सुनवाई रोकने का अनुरोध किया है। उन्होंने मांग की है कि अधिकारी मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर स्वयं त्रुटियां ठीक करें। साथ ही, उन्होंने सभी ऐसे मामलों को मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) और जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEO) की वेबसाइटों पर अपलोड करने की भी मांग की है।

मुख्यमंत्री द्वारा मांगी गई प्रमुख राहतें

ममता बनर्जी ने अदालत से निम्नलिखित निर्देश देने का अनुरोध किया है:

  • पहले जारी सभी सुनवाई नोटिस वापस लिए जाएं

  • 2002 की मतदाता सूचियों से जुड़े उन मतदाताओं के नाम न हटाए जाएं जिन्होंने दस्तावेज जमा कर दिए हैं

  • आधार को अतिरिक्त दस्तावेज मांगे बिना वैध पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाए

उन्होंने सामूहिक नाम कटौती रोकने के लिए फॉर्म 7 प्राप्तकर्ताओं की ऑनलाइन सूची प्रकाशित करने की भी मांग की है। उन्होंने स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) से अंतर-राज्यीय प्रवासन मामलों का निपटारा पांच दिनों के भीतर करने का आग्रह किया है।

इसके अलावा, उन्होंने सत्यापन प्रक्रिया से माइक्रो-ऑब्जर्वरों को हटाने की मांग की है। यदि यह संभव न हो, तो उन्हें सुनवाई और फील्ड जांच से दूर रखने की मांग की है। उन्होंने राज्य द्वारा जारी दस्तावेज स्वीकार करने और 24 जून को जारी ECI के दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करने का भी आग्रह किया है। साथ ही, उन्होंने फॉर्म 7 के तहत आपत्ति दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ताओं की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य करने की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट का पूर्व हस्तक्षेप

ममता बनर्जी ने यह याचिका उस समय दायर की, जब कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं की परेशानियां कम करने के लिए हस्तक्षेप किया था।

पिछले महीने, मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ—जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची शामिल थे—ने निर्वाचन आयोग को बाध्यकारी निर्देश जारी किए। अदालत ने प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और मतदाता-हितैषी बनाने को कहा और इस बात पर जोर दिया कि कोई भी पात्र मतदाता अपने अधिकार से वंचित न हो।

“आम लोगों पर पड़ रहे बोझ और तनाव को देखिए। एक करोड़ से अधिक लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं… हम कुछ आदेश पारित करने जा रहे हैं,” पीठ ने 12 जनवरी को कहा था।

मतदाताओं की सुरक्षा के निर्देश

अदालत ने निर्णय दिया कि विसंगतियों के आधार पर चिह्नित मतदाताओं को उचित नोटिस और पर्याप्त सहायता दी जानी चाहिए। उन्हें अपनी पहचान साबित करने का निष्पक्ष अवसर मिलना चाहिए।

पीठ ने पंचायतों और ब्लॉक कार्यालयों तक सुनवाई स्थलों का विस्तार किया। अधिकारियों को जमा किए गए दस्तावेजों की लिखित रसीद देने का निर्देश दिया गया। साथ ही, “तार्किक विसंगतियों” के लिए चिह्नित मतदाताओं की सूची स्थानीय कार्यालयों में प्रदर्शित करने को कहा गया।

अदालत ने नोट किया कि लगभग 1.25 करोड़ नोटिस जारी किए गए थे। उसने मतदाताओं को सुनवाई के दौरान परिजनों या राजनीतिक दलों के बूथ-स्तरीय एजेंटों से सहायता लेने की अनुमति दी।

कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य पर

सुप्रीम कोर्ट ने कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डाली। उसने जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को पर्याप्त स्टाफ तैनात करने का निर्देश दिया। साथ ही, पश्चिम बंगाल के पुलिस प्रमुख को शांतिपूर्ण और सुचारू प्रक्रिया के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया।

अदालत ने “तार्किक विसंगतियों” के सात प्रकार भी सूचीबद्ध किए। इनमें 2002 की सूचियों में नाम न होना, माता-पिता या दादा-दादी की उम्र से मेल न खाना, लिंग में असंगति और असामान्य रूप से बड़े परिवार रिकॉर्ड शामिल हैं।

2026 चुनावों से पहले राजनीतिक टकराव

ममता बनर्जी की यह याचिका मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लिखे गए उनके पत्र के बाद आई है। उन्होंने SIR को नौकरशाही अतिक्रमण बताया है और आरोप लगाया है कि यह हाशिए पर रहने वाले मतदाताओं को निशाना बनाता है तथा लोकतंत्र को कमजोर करता है।

कई TMC नेताओं ने पहले ही SIR को चुनौती दी है। हालांकि, ममता बनर्जी का स्वयं आगे आना और खुद मामले की पैरवी करने की तैयारी करना राजनीतिक दांव को और बढ़ा देता है। यह मामला अब 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले सबसे महत्वपूर्ण चुनाव-संबंधी कानूनी लड़ाइयों में से एक बन गया है।

29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR के खिलाफ दायर समान याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। बिहार वह पहला राज्य था, जिसने पिछले वर्ष SIR प्रक्रिया पूरी करने के बाद चुनाव कराए थे।