मद्रास हाई कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि 28 मई को बकरीद समारोह के दौरान सार्वजनिक स्थानों या गैर-निर्धारित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार का गौ वध न हो।
जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और वी लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने कहा कि प्रशासन केवल आधिकारिक रूप से स्वीकृत बूचड़खानों या कानून के तहत निर्धारित स्थानों पर ही पशु वध की अनुमति दे सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि लोग अपनी इच्छा के किसी भी स्थान पर पशुओं का वध नहीं कर सकते। अदालत ने कहा, “वध किसी भी मनचाहे स्थान पर नहीं किया जा सकता… गैर-निर्धारित स्थान पर वध करने का सवाल ही नहीं उठता।”
खंडपीठ ने यह भी कहा कि राज्य प्रशासन “लागू वैधानिक प्रावधानों को लागू करने के लिए बाध्य” है।
कोयंबटूर निवासी ने दायर की याचिका
अदालत ने यह आदेश कोयंबटूर निवासी के. सूर्या की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में आरोप लगाया गया कि स्थानीय प्रशासन ने बकरीद, जिसे ईद-उल-जुहा भी कहा जाता है, से पहले उन क्षेत्रों में गायों और बछड़ों के वध की व्यवस्था की थी जिन्हें आधिकारिक रूप से बूचड़खाना घोषित नहीं किया गया था।
सूर्या ने दावा किया कि अधिकारियों ने वध गतिविधियों के लिए “अस्थायी शेड” लगाने की अनुमति दी थी। उन्होंने यह भी कहा कि 18 मई को उन्होंने स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन को ज्ञापन देकर सार्वजनिक स्थानों पर गौ वध रोकने और कथित तौर पर अवैध वध के लिए लाई गई गायों को बचाने की मांग की थी।
हालांकि याचिकाकर्ता के अनुसार प्रशासन ने उनकी शिकायत पर कोई जवाब नहीं दिया।
अदालत ने अस्थायी बूचड़खानों पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान कोयंबटूर पुलिस ने हाई कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया। इसमें अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने कुछ “अस्थायी स्थानों” की पहचान की है जहां वध किया जा सकता है।
अदालत ने इस पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वध केवल निर्धारित स्थानों पर ही हो सकता है, तो अस्थायी शेड कानूनी बूचड़खाने कैसे बन सकते हैं।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि पुलिस अधिकारियों को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कौन-से स्थान वध क्षेत्र के रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
अदालत ने पुराने आदेशों का भी किया उल्लेख
हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत और रिट याचिका की भाषा “उचित तरीके से लिखी नहीं गई थी।” इसके बावजूद अदालत ने कहा कि इससे मामले में उठाए गए मुख्य कानूनी मुद्दे की जांच पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
अदालत ने 2020 की एक खंडपीठ के आदेश और तमिलनाडु में गौ वध कानूनों से जुड़े 1976 के एक सरकारी आदेश का भी उल्लेख किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु कानून हर परिस्थिति में गौ वध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता। हालांकि, पीठ ने कहा कि किसी भी वध गतिविधि की अनुमति देने से पहले प्रशासन को कानून में निर्धारित सभी शर्तों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा।
