भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को बेंचमार्क रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया। केंद्रीय बैंक ने अपनी मौजूदा मौद्रिक नीति का रुख बरकरार रखा क्योंकि नीति निर्माता पश्चिम एशिया में बढ़ती भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से उत्पन्न मुद्रास्फीति के जोखिमों पर नजर बनाए हुए हैं।
यह फैसला मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक समाप्त होने के बाद लिया गया। अर्थशास्त्रियों और वित्तीय बाजारों को पहले से ही उम्मीद थी कि RBI ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा। हालांकि निवेशकों और विश्लेषकों की नजर केंद्रीय बैंक की मुद्रास्फीति, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच बाहरी क्षेत्र से जुड़ी चुनौतियों पर टिप्पणियों पर बनी रही।
पहले की दर कटौती के बाद RBI ने विराम जारी रखा
इस फैसले के साथ RBI ने फरवरी 2025 से कुल 125 आधार अंकों की कटौती के बाद शुरू हुए दर कटौती चक्र में अपना विराम जारी रखा है। केंद्रीय बैंक ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक घटनाक्रमों के प्रभाव का आकलन करने के लिए सतर्क रुख अपनाया है। नीति निर्माता यह समझना चाहते हैं कि हाल के मुद्रास्फीति दबाव पिछले कई महीनों में कीमतों को नियंत्रित करने में हुई प्रगति को प्रभावित कर सकते हैं या नहीं।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से मुद्रास्फीति की चिंता
RBI की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण हाल के सप्ताहों में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे भारत में आयातित मुद्रास्फीति को लेकर चिंता बढ़ी है, क्योंकि भारत तेल आपूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर है और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है।
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आमतौर पर ईंधन लागत बढ़ाती हैं, जिसका असर परिवहन, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स खर्च पर पड़ता है। व्यवसाय अक्सर यह अतिरिक्त लागत उपभोक्ताओं पर डाल देते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
इस वजह से यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो हाल में मुद्रास्फीति में आई नरमी पर दबाव बढ़ सकता है।
कमजोर रुपया बढ़ा रहा है चुनौतियां
यह नीतिगत फैसला ऐसे समय आया है जब भारतीय रुपया प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले दबाव में है। कमजोर रुपया आयात को महंगा बना सकता है, विशेषकर कच्चे तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं को। इससे मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ सकता है तथा RBI के लिए मूल्य स्थिरता बनाए रखना और कठिन हो सकता है।
इसलिए केंद्रीय बैंक मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव और उसके आर्थिक वृद्धि व मुद्रास्फीति पर प्रभाव पर करीबी नजर रख रहा है।
वैश्विक जोखिम बने हुए हैं बड़ी चिंता
ऊर्जा कीमतों के अलावा नीति निर्माता वैश्विक व्यापार और पूंजी प्रवाह से जुड़ी अनिश्चितताओं से भी जूझ रहे हैं। अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक जारी भू-राजनीतिक तनाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकता है, निवेशकों की भावना कमजोर कर सकता है और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों में अस्थिरता बढ़ा सकता है।
इसका असर भारत के बाहरी क्षेत्र पर पड़ सकता है क्योंकि इससे आयात लागत बढ़ सकती है और पूंजी निवेश प्रभावित हो सकता है। इन जोखिमों ने RBI के सतर्क रुख को और मजबूत किया है, जिसके चलते नीति निर्माताओं ने ब्याज दरों में तत्काल बदलाव से बचने का फैसला किया है।
विकास और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन पर RBI का जोर
रेपो दर को स्थिर रखकर RBI ने संकेत दिया है कि वह आर्थिक विकास और मुद्रास्फीति नियंत्रण के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है। घरेलू आर्थिक वृद्धि अभी भी प्राथमिकता बनी हुई है, लेकिन केंद्रीय बैंक बढ़ती तेल कीमतों, कमजोर मुद्रा और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से पैदा होने वाले नए मुद्रास्फीति दबावों को लेकर सतर्क रहना चाहता है।
फिलहाल RBI ने ब्याज दरों पर आगे कोई कदम उठाने से पहले परिस्थितियों के विकास का इंतजार करने और उनका आकलन करने का फैसला किया है।
