तेहरान पर अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों में अयातोल्लाह अली खामेनेई की कथित हत्या ने क्षेत्र में नई अस्थिरता पैदा कर दी है। उनकी मौत ऐसे समय हुई है जब ईरान पहले से ही आंतरिक अशांति और आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है।
भारत के लिए यह स्थिति बड़े रणनीतिक और आर्थिक जोखिम लेकर आई है। चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
ईरान में राजनीतिक और आर्थिक संकट
ईरान गंभीर राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। कई शहरों में विरोध प्रदर्शन फैल गए हैं, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ गया है।
अशांति को नियंत्रित करने के लिए अधिकारियों ने कुछ इलाकों में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी हैं। प्रतिबंधों और महंगाई के कारण देश की अर्थव्यवस्था पहले ही दबाव में है।
इस संकट ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है। ईरान के साथ मजबूत आर्थिक संबंध रखने वाले देश स्थिति पर करीबी नजर रख रहे हैं, जिनमें भारत भी शामिल है।
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा। यह चेतावनी भारत पर अतिरिक्त दबाव डालती है, क्योंकि भारत तेहरान के साथ व्यापारिक संबंध बनाए हुए है।
भारत की रणनीति में ईरान का महत्व
भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय रणनीति में ईरान की अहम भूमिका है। यह भारत को पाकिस्तान से गुजरे बिना अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप के कुछ हिस्सों तक पहुंच प्रदान करता है।
ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह इस रणनीति का केंद्र है। यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधा व्यापार मार्ग देता है। ईरान में अस्थिरता से बंदरगाह संचालन प्रभावित हो सकता है।
चाबहार INSTC से भी जुड़ा है, जो भारत को रूस और यूरोप से जोड़ने वाला व्यापार गलियारा है। यह मार्ग परिवहन समय लगभग 40 प्रतिशत तक कम कर सकता है और लॉजिस्टिक्स लागत करीब 30 प्रतिशत घटा सकता है। इस मार्ग में बाधा भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं को कमजोर कर सकती है।
भारत-ईरान व्यापार पर खतरा
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024–25 में भारत और ईरान के बीच व्यापार लगभग 1.68 अरब डॉलर तक पहुंचा। भारत ने करीब 1.24 अरब डॉलर का निर्यात किया और 0.44 अरब डॉलर का आयात किया, जिससे भारत के पक्ष में लगभग 0.80 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष रहा।
भारत मुख्य रूप से ईरान को चावल, चाय, चीनी, दवाइयां, विद्युत मशीनरी और सिंथेटिक फाइबर निर्यात करता है। बदले में वह सूखे मेवे, रसायन और कांच उत्पाद आयात करता है।
यदि अशांति के कारण समुद्री मार्ग, बंदरगाह गतिविधियां या वित्तीय लेनदेन प्रभावित होते हैं, तो इस व्यापार को गंभीर झटका लग सकता है।
तेल आपूर्ति और होर्मुज़ जलडमरूमध्य की चिंता
ईरान तेल और गैस का बड़ा उत्पादक है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति गुजरती है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इससे भारत का आयात खर्च बढ़ेगा और घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव पड़ेगा।
पेट्रोल और डीजल की ऊंची कीमतें परिवहन लागत बढ़ाएंगी, जिससे महंगाई बढ़ेगी और घरेलू बजट पर असर पड़ेगा। परिणामस्वरूप आर्थिक वृद्धि भी धीमी पड़ सकती है।
नेतृत्व परिवर्तन और नीतिगत अनिश्चितता
खामेनेई की मौत के बाद ईरान के अगले नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है। सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया व्यापार समझौतों और क्षेत्रीय कूटनीति को प्रभावित कर सकती है।
भारत की तत्काल चिंता यह है कि चाबहार और INSTC जैसी परियोजनाएं सुचारू रूप से जारी रहेंगी या नहीं। किसी भी देरी से मध्य एशिया तक भारत की पहुंच प्रभावित हो सकती है।
साथ ही अमेरिकी टैरिफ की धमकी भारत के व्यापारिक फैसलों को और जटिल बना देती है। नई दिल्ली को अपने आर्थिक हितों और वैश्विक कूटनीतिक दबावों के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है।
भारत के लिए ईरान की स्थिरता क्यों जरूरी
ईरान की स्थिरता सीधे तौर पर भारत की व्यापार सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और कनेक्टिविटी योजनाओं को प्रभावित करती है। तेल आयात, बुनियादी ढांचा परियोजनाएं और क्षेत्रीय साझेदारियां — सभी एक स्थिर माहौल पर निर्भर हैं।
यदि संकट गहराता है, तो भारत को बढ़ती ऊर्जा लागत, बाधित व्यापार और रणनीतिक झटकों का सामना करना पड़ सकता है। बढ़ते तनाव के बीच भारत को अपने आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए भू-राजनीतिक जोखिमों का प्रबंधन करना होगा।
ईरान में हो रहे घटनाक्रम केवल क्षेत्रीय मुद्दे नहीं हैं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं।
