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सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट से खेड़ा को राहत मिलने के बाद असम के मुख्यमंत्री से उनके रुख पर पुनर्विचार करने की अपील की
अभिषेक मनु सिंघवी ने पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद हिमंत बिस्वा सरमा से अपील की और गिरफ्तारी में संयम बरतने पर जोर दिया।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी पर की गई टिप्पणी से जुड़े मामले में पवन खेड़ा को राहत देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को मजबूत करता है। उनके अनुसार, गिरफ्तारी का इस्तेमाल सामान्य रूप से नहीं होना चाहिए और यह “पहला नहीं बल्कि अंतिम विकल्प” होना चाहिए।

असम के मुख्यमंत्री से सीधी अपील

सिंघवी ने साथ ही सरमा से सीधी अपील भी की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जल्द ही चुनाव परिणामों का सामना कर सकते हैं, 4 मई को होने वाली मतगणना का जिक्र करते हुए। उन्होंने कहा, “एक बड़ा मुद्दा भी है,” और जोड़ा, “मैं यह कहकर शुरुआत करता हूं कि मैं असम के मुख्यमंत्री को सलाह देने वाला कोई नहीं हूं।”

इसके बाद उन्होंने विनम्र अनुरोध किया, “मैं हाथ जोड़कर असम के मुख्यमंत्री से निवेदन करता हूं… क्या वे इस फैसले में झलक रहे अपने रुख पर ईमानदारी से पुनर्विचार नहीं करना चाहेंगे?”

इस्तेमाल की गई भाषा पर आलोचना

सिंघवी ने सरमा से जुड़ी भाषा की भी आलोचना की, जिसका जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणियों में किया था। उन्होंने उन टिप्पणियों को “दोहराने योग्य नहीं, छापने योग्य नहीं और कहने योग्य नहीं” बताया। उन्होंने कहा कि अदालत ने भी कुछ हिस्सों को अपने फैसले में शामिल नहीं किया।

सिंघवी के अनुसार, ऐसी भाषा “हमारे लोकतंत्र को वास्तव में गिराती है” और “उसका मूल्य कम करती है।” उन्होंने कहा कि बिना औपचारिक माफी के भी खेद जताना मुख्यमंत्री की गरिमा को “और बढ़ा सकता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने उन टिप्पणियों का बचाव या समर्थन नहीं किया।

सरमा का कड़ा जवाब

जवाब में हिमंत बिस्वा सरमा ने सिंघवी की टिप्पणियों को सख्ती से खारिज किया। उन्होंने कहा कि उन्हें सिंघवी से “लोकतंत्र, सार्वजनिक संवाद या शालीनता पर कोई सबक लेने की जरूरत नहीं है” और जोड़ा कि “शालीनता और वे एक साथ कभी नहीं हो सकते।”

सरमा ने कहा कि यह मामला “एक ऐसी महिला से जुड़ा है जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।” उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय टीवी पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए उनके चरित्र पर हमला किया गया।

उन्होंने भरोसा जताया कि अदालतें कार्रवाई करेंगी और “दोषियों को सजा मिलेगी”। उन्होंने इसे चुनाव को प्रभावित करने की “खुली कोशिश” बताया।

उन्होंने सिंघवी पर बिना जवाब का मौका दिए सार्वजनिक बयान देने का आरोप भी लगाया और कहा कि यह “कोई बहस नहीं है” बल्कि निष्पक्ष चर्चा से बचने की कोशिश है। अंत में उन्होंने चेतावनी दी, “यह सिर्फ शुरुआत है, अंत नहीं।”

कांग्रेस ने फैसले को संविधान की जीत बताया

इस बीच कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया।

उन्होंने कहा, “आज संविधान की जीत हुई है… यह खुशी का दिन है।” उन्होंने आगे कहा, “हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं। हम प्रयास जारी रखेंगे, लेकिन आज का फैसला जनता को बताता है कि संविधान के रक्षक अभी भी मौजूद हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

न्यायमूर्ति जेके महेश्वरी और अतुल एस चंदूरकर की पीठ ने पवन खेड़ा को अग्रिम जमानत दी। अदालत ने कहा कि यह मामला हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता से ज्यादा राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित लगता है। उसने कहा कि आरोपों की सच्चाई का परीक्षण मुकदमे के दौरान किया जा सकता है।

न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 339 का उल्लेख उचित नहीं है।

खेड़ा पर लगाई गई शर्तें

अदालत ने खेड़ा को जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया। उन्हें जरूरत पड़ने पर पुलिस के सामने पेश होना होगा और गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं होगी।

इसके अलावा, वे बिना पूर्व अनुमति के भारत छोड़कर नहीं जा सकते। ट्रायल कोर्ट जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त शर्तें लगा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल जमानत के फैसले तक सीमित हैं और मामले के अंतिम परिणाम को प्रभावित नहीं करेंगी।

मामले की पृष्ठभूमि

खेड़ा ने 24 अप्रैल को गुवाहाटी हाई कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत से इनकार किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि हिरासत में पूछताछ की जरूरत हो सकती है और धारा 339 के तहत जालसाजी के आरोपों का हवाला दिया था। ये आरोप असम पुलिस के इस दावे पर आधारित थे कि खेड़ा द्वारा इस्तेमाल किए गए दस्तावेज फर्जी थे।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में धारा 339 का जिक्र नहीं था और इस आरोप पर हाई कोर्ट की टिप्पणियां सही नहीं लगतीं।