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ईरान ने समझौते के लिए जताई इच्छा, लेकिन इज़राइल को लेकर खींची लाल रेखा
ईरान ने कहा है कि अमेरिका के साथ समझौता तभी संभव है जब वाशिंगटन इस्लामाबाद में शुरू हो रही अहम वार्ता के दौरान इज़राइल के बजाय अपने हितों को प्राथमिकता दे।

ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रज़ा आरिफ़ ने कहा है कि अमेरिका के साथ संभावित समझौता इस बात पर निर्भर करेगा कि वाशिंगटन “इज़राइल फर्स्ट” नीति के बजाय “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण अपनाता है या नहीं।

उनका यह बयान ईरान और अमेरिका के बीच होने वाली महत्वपूर्ण युद्धविराम वार्ता से ठीक पहले आया है, जो इस्लामाबाद में होने वाली है। इन बातचीतों का उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को समाप्त करना है।

उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंचे

पाकिस्तान इन महत्वपूर्ण वार्ताओं की मेजबानी कर रहा है और दोनों पक्षों के वरिष्ठ नेता पहले ही वहां पहुंच चुके हैं। ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मोहम्मद बाघेर गालिबाफ कर रहे हैं, जबकि अमेरिकी टीम की अगुवाई उपराष्ट्रपति जे डी वांस कर रहे हैं।

बातचीत की शुरुआत अप्रत्यक्ष रूप से होने की उम्मीद है, जिसमें दोनों प्रतिनिधिमंडलों को अलग-अलग कमरों में रखा जाएगा और पाकिस्तानी अधिकारी मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे।

तेहरान की कड़ी चेतावनी

आरिफ़ ने साफ कहा कि ईरान का रुख अमेरिकी वार्ताकारों के दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर वाशिंगटन इज़राइल के हितों को प्राथमिकता देता है, तो तेहरान वार्ता से हट जाएगा और अपनी प्रतिक्रिया को और तेज करेगा।

उन्होंने X पर लिखा, “अगर हम इस्लामाबाद में ‘अमेरिका फर्स्ट’ के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करते हैं, तो दोनों पक्षों और दुनिया के लिए लाभकारी समझौते की संभावना है। लेकिन अगर हमारे सामने ‘इज़राइल फर्स्ट’ के प्रतिनिधि होंगे, तो कोई समझौता नहीं होगा। ऐसे में हम पहले से भी अधिक मजबूती से अपनी रक्षा जारी रखेंगे और दुनिया को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।”

संघर्ष की पृष्ठभूमि

मौजूदा तनाव 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमले किए थे। इन हमलों में कथित तौर पर कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत हुई, जिनमें सर्वोच्च नेता अली खामेनेई भी शामिल बताए गए।

इस संघर्ष के कारण ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि हुई, वैश्विक यात्रा प्रभावित हुई और खाड़ी देशों में सुरक्षा चिंताएं बढ़ गईं। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अस्थायी युद्धविराम की घोषणा की, जिससे वार्ता के लिए रास्ता बना।

प्रमुख मुद्दों पर मतभेद

युद्धविराम के बावजूद दोनों पक्षों के बीच कई बड़े मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।

सबसे बड़ा विवाद लेबनान को लेकर है। ईरान का कहना है कि किसी भी समझौते में लेबनान में इज़राइली हमलों को रोकना शामिल होना चाहिए। हालांकि अमेरिका और इज़राइल दोनों ने इस मांग को खारिज कर दिया है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित नहीं करने चाहिए और उसने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम के भंडार को हटाने की मांग की है।

हालांकि ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका यूरेनियम हटाने में ईरान के साथ काम करने को तैयार है, लेकिन तेहरान ने अभी तक इस प्रस्ताव पर आधिकारिक सहमति नहीं दी है।

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और पाकिस्तान की भूमिका

जे डी वांस पहले ही जैरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ के साथ इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं। उनका स्वागत पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, गृह मंत्री मोहसिन नकवी और विदेश मंत्री इशाक डार ने किया।

इन वार्ताओं के दौरान पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच संवाद को सुगम बनाते हुए महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।

संघर्ष की बढ़ती मानवीय कीमत

चल रहे संघर्ष में भारी जनहानि हुई है। ईरान की सरकारी मीडिया द्वारा उद्धृत एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के अनुसार, ईरान में अब तक 3,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि सरकार ने अभी तक आधिकारिक मृतकों की संख्या जारी नहीं की है।