संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक बार फिर रूस और चीन के साथ त्रिपक्षीय परमाणु हथियार वार्ता की मांग की है। वॉशिंगटन ने चीन पर यह आरोप भी लगाया कि वह गुप्त रूप से परमाणु हथियारों का परीक्षण कर रहा है और ऐसे समय में अपने परमाणु शस्त्रागार का तेज़ी से विस्तार कर रहा है, जब वैश्विक हथियार नियंत्रण व्यवस्थाएँ कमजोर पड़ रही हैं।
यह पहल न्यू स्टार्ट (New START) संधि की समाप्ति के कुछ ही दिनों बाद सामने आई है। यह अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों की संख्या को सीमित करने वाला आख़िरी बड़ा समझौता था। वॉशिंगटन के अधिकारियों ने चेतावनी दी कि इस संधि के खत्म होने से शक्तिशाली देशों के बीच परमाणु प्रतिस्पर्धा का एक नया दौर शुरू हो सकता है।
चीन ने वार्ता में शामिल होने से इनकार किया
हालाँकि, चीन ने दोहराया कि मौजूदा परिस्थितियों में वह परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ताओं में शामिल नहीं होगा। बीजिंग लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि उसका परमाणु भंडार अमेरिका और रूस की तुलना में कहीं छोटा है। इसलिए उसके अनुसार हथियारों में कटौती की मुख्य ज़िम्मेदारी दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों—अमेरिका और रूस—की है।
इसी दौरान रूस ने अलग रुख अपनाया। मॉस्को ने कहा कि भविष्य में कोई भी हथियार नियंत्रण समझौता केवल अमेरिका और रूस तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अन्य परमाणु संपन्न देशों को भी शामिल किया जाना चाहिए। यह रुख रूस की उस सोच को दर्शाता है कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन बदल चुका है।
अमेरिका का कहना: द्विपक्षीय समझौते अब पर्याप्त नहीं
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि केवल दो देशों के बीच परमाणु समझौतों का दौर अब खत्म हो चुका है। एक ऑनलाइन नीति लेख में उन्होंने तर्क दिया कि हथियार नियंत्रण को अब बहुध्रुवीय परमाणु दुनिया के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने ज़ोर दिया कि चीन की बढ़ती परमाणु शक्ति के कारण उसकी भागीदारी आवश्यक हो गई है।
रुबियो ने लिखा, “रणनीतिक स्थिरता केवल दो देशों पर निर्भर नहीं रह सकती,” और हथियार विकास की गति और पैमाने के कारण चीन की विशेष ज़िम्मेदारी की ओर इशारा किया।
न्यू स्टार्ट के अंत से वैश्विक चिंता
न्यू स्टार्ट संधि के तहत अमेरिका और रूस—दोनों के लिए तैनात परमाणु वारहेड्स की सीमा 1,550 तय की गई थी। इसके समाप्त होने के साथ ही दशकों बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब दुनिया के दो सबसे बड़े परमाणु शस्त्रागार किसी भी संधि के तहत नियंत्रित नहीं हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे हथियारों के आधुनिकीकरण और तैनाती की रफ्तार तेज़ हो सकती है। साथ ही देशों के बीच पारदर्शिता और सत्यापन की व्यवस्था भी कमजोर पड़ सकती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसमें संधि की सीमाओं को एक साल के लिए बढ़ाने की बात कही गई थी। इसके बजाय ट्रंप ने एक व्यापक और अद्यतन समझौते की मांग की, जिसमें अधिक देश शामिल हों और जो मौजूदा सैन्य वास्तविकताओं को दर्शाए।
अमेरिका ने चीन पर गुप्त परमाणु परीक्षण का आरोप लगाया
हथियार नियंत्रण मामलों के लिए अमेरिकी उप विदेश मंत्री थॉमस डि नैनो ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण सम्मेलन में वॉशिंगटन की योजना पेश की। उन्होंने कहा कि समाप्त हो चुकी न्यू स्टार्ट संधि में “मौलिक खामियाँ” थीं।
उन्होंने चीन पर आरोप लगाया कि उसने अमेरिका और रूस पर लगी सीमाओं का फायदा उठाकर चुपचाप अपनी परमाणु शक्ति बढ़ाई। उनका दावा था कि चीन “2030 तक 1,000 से अधिक परमाणु वारहेड्स रखने की राह पर है।”
डि नैनो ने कहा, “आज की स्थिति में चीन के पूरे परमाणु शस्त्रागार पर कोई सीमा नहीं है, कोई पारदर्शिता नहीं है, कोई घोषणा नहीं है और कोई नियंत्रण नहीं है।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चीन ने गुप्त रूप से “परमाणु विस्फोट परीक्षण किए हैं, जिनमें सैकड़ों टन क्षमता वाले परीक्षणों की तैयारी भी शामिल है।” उनके अनुसार, ऐसा ही एक परीक्षण 22 जून 2020 को किया गया था। उन्होंने चीन पर यह आरोप भी लगाया कि उसने इन परीक्षणों को छिपाने की कोशिश की, क्योंकि उसे पता था कि ये परीक्षण प्रतिबंध प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करते हैं।
पिछले साल ट्रंप ने भी ऐसे ही संकेत दिए थे, लेकिन उस समय कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की थी।
डि नैनो ने यह भी कहा कि अमेरिका दशकों बाद पहली बार रूस और चीन के साथ “समान आधार” पर परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करना चाहता है, हालांकि अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
चीन ने अमेरिकी आरोपों को खारिज किया
चीन ने इन आरोपों को सख्ती से नकार दिया। उसके राजदूत शेन जियान ने वॉशिंगटन पर “गैर-जिम्मेदाराना बयान देने, जैसे परमाणु हथियार परीक्षण की धमकी देने” का आरोप लगाया।
उन्होंने सम्मेलन में चीन की आधिकारिक स्थिति दोहराते हुए कहा, “चीन इस चरण में परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ताओं में भाग नहीं लेगा।”
उन्होंने आगे कहा, “सबसे बड़े परमाणु शस्त्रागार रखने वाले देशों को परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए अपनी विशेष और प्राथमिक ज़िम्मेदारियों को निभाना चाहिए।”
रूस ने व्यापक वार्ता की मांग की
अमेरिका और रूस मिलकर दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक परमाणु हथियार रखते हैं। हालांकि, चीन का परमाणु भंडार सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, चीन 2023 से हर साल लगभग 100 नए वारहेड्स जोड़ रहा है।
रूस ने कहा कि वह अब खुद को न्यू स्टार्ट की सीमाओं से बंधा हुआ नहीं मानता। उसके राजदूत गेन्नादी गाटिलोव ने कहा कि किसी भी नई परमाणु चर्चा में फ्रांस और ब्रिटेन जैसे अन्य परमाणु देशों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
ब्रिटेन ने इस विचार को खारिज करता हुआ रुख अपनाया। उसके राजदूत डेविड राइली ने कहा, “यूनाइटेड किंगडम एक न्यूनतम, विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखता है।” उन्होंने जोड़ा कि वार्ता का मुख्य फोकस “सबसे बड़े परमाणु शस्त्रागार रखने वाले देशों—चीन, रूस और अमेरिका—पर होना चाहिए।”
वहीं, फ्रांस की राजदूत ऐन लाज़ार-सुरी ने कहा कि पेरिस का मानना है कि “परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के जोखिम को कम करने में सक्षम ठोस उपाय” सभी परमाणु संपन्न देशों का लक्ष्य होना चाहिए।
