ईरान भर में विश्वविद्यालयों के दोबारा खुलने के साथ ही बड़ी संख्या में छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। इस तरह संगठित कैंपस विरोध प्रदर्शन पिछले महीने सरकार की कार्रवाई के बाद इस स्तर पर पहली बार फिर दिखाई दिए हैं।
नए शैक्षणिक सत्र के साथ प्रदर्शन फिर शुरू
शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत होते ही विश्वविद्यालय परिसरों में नारेबाज़ी और संगठित प्रदर्शनों की आवाज़ फिर गूंजने लगी। कई प्रमुख संस्थानों में हजारों छात्रों ने रैलियां कीं। यह उन विरोध प्रदर्शनों के बाद पहली बड़ी लामबंदी है, जिन्हें पहले प्रशासन ने सख्ती से दबा दिया था।
ये प्रदर्शन ईरानी नेतृत्व के लिए बेहद संवेदनशील समय में हो रहे हैं। सरकार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर बढ़ते दबाव का सामना कर रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने “अधिकतम दबाव” अभियान को तेज कर दिया है। वॉशिंगटन ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नए कूटनीतिक अल्टीमेटम जारी किए हैं। साथ ही फारस की खाड़ी में सैन्य स्ट्राइक समूहों की तैनाती भी बढ़ाई है।
असंतोष के पीछे कई कारण
ये विरोध प्रदर्शन सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह की शिकायतों का परिणाम हैं। विश्वविद्यालय परिसरों में छात्र नैतिकता नियमों के फिर से कड़ाई से लागू किए जाने का विरोध कर रहे हैं। वे छात्र व्यवहार की निगरानी के लिए उन्नत निगरानी प्रणालियों की स्थापना का भी विरोध कर रहे हैं।
इसके अलावा, कई छात्र पहले के विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किए गए छात्र कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग कर रहे हैं। उनकी निरंतर हिरासत एक प्रमुख मुद्दा बन गई है।
हालांकि असंतोष केवल नागरिक अधिकारों तक सीमित नहीं है। ईरान का आर्थिक संकट युवाओं में निराशा को और गहरा कर रहा है। देश में महंगाई ऊंची है और स्नातकों के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं। कई छात्र अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।
तेहरान विश्वविद्यालय में एक पोस्टर पर लिखा था: “हम ऐसे भविष्य के लिए पढ़ाई कर रहे हैं जो अस्तित्व में ही नहीं है।”
विरोध के केंद्र के रूप में विश्वविद्यालय
ईरान में कैंपस विरोध प्रदर्शनों का ऐतिहासिक महत्व रहा है। विश्वविद्यालय अक्सर बड़े राजनीतिक आंदोलनों की शुरुआत का केंद्र रहे हैं। 1999 का छात्र आंदोलन शैक्षणिक संस्थानों से शुरू हुआ था। हाल ही में 2022 में महसा अमीनी की मृत्यु के बाद भी देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे।
इसी पृष्ठभूमि के कारण सुरक्षा विश्लेषक स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए हैं। फिलहाल प्रदर्शन मुख्य रूप से विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या वे समाज के अन्य वर्गों तक फैलेंगे।
विशेषज्ञ खास तौर पर पारंपरिक बाजारों और प्रमुख श्रमिक संगठनों की प्रतिक्रिया पर ध्यान दे रहे हैं। यदि व्यापारी और औद्योगिक श्रमिक इस आंदोलन से जुड़ते हैं, तो प्रशासन कैंपस-स्तरीय नियंत्रण से आगे बढ़कर व्यापक और अधिक सख्त राष्ट्रव्यापी कार्रवाई कर सकता है।
इंटरनेट बंदी की आशंका
पिछले अनुभवों ने जनता की चिंता बढ़ा दी है। पिछली बड़ी अशांति के दौरान अधिकारियों ने लंबे समय तक इंटरनेट बंद कर दिया था। इससे प्रदर्शनकारियों के बीच संचार बाधित हुआ और बाहरी दुनिया तक सूचनाएं पहुंचने में रुकावट आई।
मानवाधिकार संगठनों ने बाद में आरोप लगाया था कि उस अवधि में हजारों प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। नए सत्र की शुरुआत के साथ कई छात्रों को आशंका है कि यदि प्रदर्शन बढ़े, तो सरकार फिर से डिजिटल ब्लैकआउट लागू कर सकती है।
कुल मिलाकर, ईरान इस समय एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। सामाजिक प्रतिबंधों और आर्थिक कठिनाइयों के कारण छात्रों का गुस्सा फिर उभर आया है। वहीं अंतरराष्ट्रीय दबाव भी लगातार बढ़ रहा है। ये प्रदर्शन केवल कैंपस तक सीमित रहेंगे या व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लेंगे, यही देश के अगले राजनीतिक अध्याय को तय कर सकता है।
